पत्र लेखन विधि | आवश्यकता | परिभाषा | विशेषता | महत्त्व | अंग | प्रारूप

पत्र लेखन की आवश्यकता


मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अपने दुख-सुख दूसरों में बाँटना चाहता है। जब उसका कोई प्रिय व्यक्ति उसके पास होता है तब वह मौखिक रूप से अभिव्यक्त कर देता है परंतु जब वही व्यक्ति दूर होता है तब वह पत्रों के माध्यम से अपनी बातें कहता और उसकी बातें जान पाता है वास्तव में पत्र मानव के विचारों के आदान-प्रदान का अत्यंत सरल और सशक्त माध्यम है। पत्र हमेशा किसी को संबोधित करते हुए लिखे जाते हैं, अत: यह लेखन की विशिष्ट विधा एवं कला है। पत्र पढ़कर हमें लिखने वाले के व्यक्तित्व की झलक मिल जाती है।

पत्र की परिभाषा


जब हम मनुष्य लिखित माध्यम से अपने विचारों को दुसरे तक पहुंचाते हैं तब पत्र लेखन की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। पत्र में आत्मीयता व संस्कार की झलक स्पष्ट देखी जा सकती है।


पत्र की विशेषताएं


उद्देश्य पूर्णता- कोई भी पत्र अपने कथन या मंतव्य में स्वतः संपूर्ण होना चाहिए। उसे पढ़ने के बाद तद्विषयक किसी प्रकार की जिज्ञासा, शंका या स्पष्टीकरण की आवश्यकता शेष नहीं रहनी चाहिए। पत्र लिखते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कथ्य अपने आप में पूर्ण तथा उद्देश्य की पूर्ति करने वाला हो।

शिष्टता-सरकारी, व्यावसायिक तथा अन्य औपचारिक पत्र की भाषा-शैली शिष्टतापूर्ण होनी चाहिए। अस्वीकृति, शिकायत, खीझ या नाराजगी भी शिष्ट भाषा में ही प्रकट की जाए तो उसका अधिक प्रभाव पड़ता है।

चिह्नांकन- पत्र में प्रयुक्त चिह्न पर हमें विशेष ध्यान देना चाहिए। चिह्न से अंकित अनुच्छेद का प्रयोग करना चाहिए। प्रत्येक नए विचार, नई बात के लिए पैराग्राफ, अल्प-विराम, अद्र्ध-विराम, पूर्ण विराम, कोष्टक आदि का प्रयोग उचित स्थल पर ही होना चाहिए।

सरलता-पत्र सरल भाषा में लिखना चाहिए। भाषा सीधी, स्वाभाविक व स्पष्ट होनी चाहिए। अतः पत्र में व्यक्ति को पूरी आत्मीयता और सरलता से उपस्थित होना चाहिए।

प्रभावोत्पादकता-पत्र की शैली ऐसी हो जिससे पाठक प्रभावित हों। हमारे विचारों की छाप पत्र में स्पष्ट दिखाई देनी चाहिए। इसके लिए शैली परिमार्जित होनी चाहिए। वाक्यों का नियोजन, शब्दों का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग अच्छी भाषा के आवश्यक गुण हैं।

आकर्षकता व मौलिकता-पत्र का आकर्षक व सुंदर होना भी महत्त्वपूर्ण होता है। मौलिकता भी पत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। पत्र में घिसे-पिटे वाक्यों के प्रयोग से बचना चाहिए। पत्र-लेखक को पत्र में स्वयं के विषय में कम तथा प्राप्तकर्ता के विषय गुण में अधिक लिखना चाहिए।

स्पष्टता-पत्र की भाषा में स्पष्टता होनी चाहिए। स्पष्ट तथा मधुर भाषा वाला पत्र प्रभावी होता है। शब्दों का चयन, वाक्य रचना की सरलता पत्र को प्रभावशाली बनाती है।

संक्षिप्तता-पत्र की भाषा में संक्षिप्तता होनी चाहिए। उसमें अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए। संक्षिप्तता का अर्थ है पत्र अपने आप में पूर्ण हो। व्यर्थ के शब्द जाल से मुक्त होना चाहिए।


पत्र के अंग


पत्र लिखने वाले का पता तथा तिथि

आजकल ये दोनों पत्र के ऊपर बाएँ कोने में लिखे जाते हैं। निजी अथवा व्यक्तिगत पत्रों में प्रायः यह नहीं लिखे जाते किंतु व्यावसायिक और कार्यालयी पत्रों में पते के साथ-साथ प्रेषक का नाम भी लिखा जाता

पाने वाले का नाम व पता

प्रेषक के बाद पृष्ठ की बाई ओर पत्र पाने वाले का नाम व पता लिखा होता है। नाम के स्थान पर कभी-कभी केवल पदनाम भी लिखते हैं। कभी-कभी नाम तथा पदनाम दोनों लिखे जाते हैं। पानेवाले का विवरण इस प्रकार होना चाहिए नाम, पदनाम, कार्यालय का नाम, स्थान, शहर, जिला और पिन कोड।

विषय-संकेत

औपचारिक पत्रों में यह आवश्यक होता है कि जिस विषय में पत्र लिखा जा सकता है उस विषय को अत्यंत संक्षेप में पाने वाले के नाम और पते के पश्चात् बाई ओर से विषय शीर्षक देकर लिखें। इससे पत्र देखते ही पता चल जाता है कि मूल रूप में पत्र का विषय क्या है।

संबोधन

विषय के बाद पत्र के थाई और संबीयन सूचक शब्द का प्रयोग किया जाता है। व्यक्तिगत पत्र में प्रिय लिखकर प्राप्तकर्ता का नाम या उपनाम दिया जाता है। जैसे-प्रिय सचेत, प्रिय रेखा, प्रिय नरेश, प्रिय अरुणा। अपने से बड़ों के लिए प्रिय के स्थान पर पूज्य, मान्यवर, श्रद्धेय आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। सरकारी पत्रों में प्रिय महीदय/प्रिय महोदया लिखा जाता है।

पत्र की मुख्य सामग्री

सम्बोधन के पश्चात् पत्र की मूल सामग्री लिखी जाती है। आवश्यकता, समय तथा परिस्थिति के अनुसार विषय में 
परिवर्तन होता रहता है।

पत्र की समाप्ति

पत्र की समाप्ति पर प्रेषक प्राप्तकर्ता से अपने सबंध के अनुसार समापन सूचक शब्दों का प्रयोग कर पत्र समाप्त करता है। बड़ों के लिए आपका आज्ञाकारी', 'आपका प्रिय', बराबर वालों के लिए स्नेहशील, दर्शनाभिलाषी, स्नेही और छोटों के लिए 'शुभचिंतक' 'शुभाकांक्षी' जैसे-शब्दों का प्रयोग किया जाता है। औपचारिक तथा व्यावसायिक पत्रों में साधारणतः भवदीय' लिखा जाता है।

हस्ताक्षर एवं नाम

समापन शब्द के ठीक नीचे भेजने वाले के हस्ताक्षर होते हैं। हस्ताक्षर के ठीक नीचे कोष्ठक में भेजने वाले का पूरा नाम तथा पता भी अवश्य लिख देना चाहिए। हस्ताक्षर प्रायः सुपाठ्य नहीं होते इस कारण नाम भी लिखना चाहिए।

संलग्नक

सरकारी-पत्रों में प्रायः मूलपत्र के साथ अन्य आवश्यक कागजात भी भेजे जाते हैं। उन्हें इस पत्र के 'संलग्न-पत्र' या 'संलग्नक' कहते हैं। सलंग्न-पत्र में 'सलग्नक' शीर्षक लिखकर उसके आगे संख्या 1, 2, 3, 4, 5 के द्वारा संकेत दिया जाता है।

पुनश्च

कभी-कभी पत्र लिखते समय मूल सामग्री में से किसी महत्त्वपूर्ण अंश के छूट जाने पर इसका प्रयोग किया जाता है।

पता

लिफाफे पोस्टकार्ड/अंतर्देशीय पत्र के बाहर पत्र-प्रेषक को अपना नाम लिखना चाहिए। यदि पत्र में ऊपर दाहिनी ओर अपना पूर्ण पता नहीं दिया गया है तो उसे यहाँ लिख देना चाहिए।

पत्र प्राप्त करने वाले का पता पत्र प्राप्त करने वाले का पता बाहर लिफाफे पोस्टकाई/अंतर्देशीय पत्र पर लिख देना चाहिए।

पत्र का महत्व


आज के अति व्यस्त युग में पत्र-लेखन का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। आज के युग में मानव के संबंधों का दायरा बहुत बढ़ गया है। प्रतिदिन व्यक्ति को अनेक व्यक्तियों, संबंधियों, कार्यालयों से संपर्क साधना पड़ता है। प्रत्येक स्थान पर वह स्वयं तो नहीं जा सकता अतः उसे पत्र का सहारा लेना पड़ता है।

पत्र में हमें शब्दों का सोच-समझकर प्रयोग करना चाहिए क्योंकि जिस प्रकार धनुष से छूटा तीर वापस नहीं आता उसी प्रकार पत्र में लिखे शब्दों को वापस नहीं लौटा सकते। पत्रों की उपयोगिता हर काल में रही है और रहेगी। मोबाइल फ़ोन और संचार के अन्य साधनों का विकास होने के बाद पत्र-लेखन प्रभावित हुआ है, पर इसकी महत्ता सदैव बनी रहेगी।

पत्र के प्रकार


पत्र दो प्रकार के होते हैं- (क) औपचारिक पत्र (ख) अनौपचारिक पत्र।

(क) औपचारिक पत्र- अर्ध-सरकारी, गैर-सरकारी या सरकारी कार्यालय को जो भी पत्र लिखे जाते हैं, वे सभी पत्र औपचारिक पत्रों के अंतर्गत आते हैं। कार्यालय द्वारा अपने अधीनस्थ विभागों को जो पत्र लिखे जाते हैं, वे सब भी इसी श्रेणी में आते हैं।

(ख) अनौपचारिक पत्र- जो पत्र निजी, व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक होते हैं, वे 'अनौपचारिक' पत्र कहलाते हैं। इस पत्र में किसी तरह की औपचारिकता के निर्वाह का बंधन नहीं होता। इन पत्रों में प्रेषक अपनी बात व भावना को उन्मुक्तता के साथ, बिना लाग-लपेट लिख सकता है।

औपचारिक पत्र का प्ररूप


सेवा में,
.................. अधिकारी का पद
.................... संस्था का नाम
विषय ...............................................
महोदय/आदरणीय/श्रीमान जी,
............................... मुख्य विषय वस्तु
..................................समापन
धन्यवाद
प्रार्थी का नाम..............
दिनांक ................

अनौपचारिक पत्र का प्रारूप


.....................प्रेषक का नाम व पता
दिनांक...........
..................... संबोधन
...................... यथा योग्य अभिवादन
.................................कुशल क्षेम ज्ञापन
................................. मुख्य विषय वस्तु
................................. समापन
.............. संबंध का उल्लेख
.............. प्रेषक का नाम

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