टोपी का सारांश प्रश्न उत्तर

टोपी पाठ का सारांश / सार / प्रश्न उत्तर  

टोपी कहानी का सार 

प्रस्तुत पाठ 'टोपी' श्री सृंजय द्वारा रचित एक श्रेष्ठ कहानी है। इसमें उन्होंने उच्चवर्ग पर कटाक्ष किया है कि वह किस प्रकार गरीबों का शोषण करता है। दूसरी तरफ एक गरीब गौरैया पक्षी उचित मूल्य देकर अपना कार्य भली-भाँति करवा लेती है।

एक गौरैया और एक गवरा में अनूठा प्रेम था। दोनों अपने सभी कार्य साथ-साथ करते थे। एक दिन अचानक गौरैया नर गौरैये से बोली कि मनुष्य रंग-बिरंगे कपड़ों में कितना सुंदर लगता है। गवरा बोला कि कपडा वास्तविक सुंदरता को दबा देता है तथा बनावटीपन उभर आता है। गवरइया कहती है कि कपड़ा मात्र अच्छा लगने के लिए नहीं पहना जाता अपितु यह मौसम से बचाव भी करता है। दोनों में वाद-विवाद होने लगता है। गवरा कहता है कि कपड़ा पहनने से व्यक्ति की औकात का पता चल जाता है, जिससे आपसी भेदभाव को जन्म मिलता है। मनुष्य सिर के बालों को टोपी से ढक लेता है। लेकिन हम बिना कपड़ों के ही अच्छे हैं। यह बात सुनते हो गवरड्या का मन भी टोपी पहनने को करने लगा। वह टोपी पहनने की जिद्द करने लगी ।

गवरा टोपी के गुण-दोषों को बतलाने लगा कि टोपी को आदमियों का राजा पहनता है। अत: तू टोपी के चक्कर में बिलकुल मत पड़ना। गवरइया अपनी जिद्द पर अड़ी हुई थी और अपनी इच्छा पूरी करना चाहती थी। प्रतिदिन की तरह अगले दिन दोनों दाना चुगने के लिए चले गए। दाना चुगते-चुगते अचानक गौरैया को कपास का फाहा मिला । उसे प्राप्त कर गवरइया खुशी से नाचने लगी और खुशी से चिल्लाने लगी कि मिल गया मिल गया, मुझे मिल गया। तभी गवरा ने चौककर पूछा कि अरे! तुझे क्या मिल गया? गवरझ्या बोली, "मिल गया... मिल गया.. टोपी का जुगाड़ मिल गया।"

गवरा गवरइया को समझाते हुए बोला, "इक रुई के फाहे से लेकर टोपी तक का सफर...तुझे कुछ अता-पता है ?" लेकिन गवरइया ने उसकी एक न सुनी। वह रुई के फाहे को लेकर रुई धुनने वाले के पास गई और प्यार भरे स्वर में उसे रुई धुनने को कहा धुनिया बूढ़ा एवं गरीब था। वह गवरइया पर चिल्लाते हुए उसे भगाने लगा। उसने कहा कि वह अभी राजा जी के लिए रजाई बना रहा है; इस पर गवरइया बोली धुनने के बाद जो कुछ प्राप्त होगा, उसका आधा तुम ले लेना और आधा मैं ले लँगी। धुनिया इतना अच्छा अवसर गँवाना नहीं चाहता था अत: उसने सौदा स्वीकार कर लिया और कुछ ही देर में रुई धुनकर तैयार कर दी।

धुनी हुई रुई को लेकर अब गवरइया सूत कातने वाले 'कोरी' के पास गई। उसने भी धुनिया के समान उसे डाँट दिया। लेकिन जब गौरैया ने आधे आधे की बात कही तो सूत कातने वाला उसी समय तैयार हो गया।

सूत बन जाने के बाद गवरा और गवरइया एक बुनकर के पास गए और बोले, "बुनकर भइया, बुनकर भइया, इस कते सूत से कपड़ा बुन दो।" बुनकर दोनों को भगाते हुए कहने लगा कि चलो हटो उसे अभी राजा जी के लिए बागा बुनना है कुछ ही समय में राजा के सेवक आते होंगे। इतना कहकर वह अपने काम में लग गया। कुछ क्षणों बाद गवरइया ने पुनः अपने साहस को बटोरकर कहा, "हम सेंत-मेंत का काम नहीं करवाते। इसे बुन दे और आधा तू ले ले, आधा हम ले लेंगे।" बुनकर ने उसी समय गवरइया की बात मान ली। बुनकर ने अपने हिस्से का आधा कपड़ा लेकर शेष गवरइया को दे दिया।

अब गवरइया कपड़े को लेकर दर्जी के पास गई और उससे कहने लगी "दर्जी भुइया. दर्जी भइया, इसकी टोपी सिल दो।" दर्जी बड़ी ही रोषपूर्ण वाणी में बोला, "खिसकती हो कि नहीं यहाँ से। देखते नहीं राजा जी की सातवीं रानी से नौ बेटियों के बाद दसवाँ बेटा पैदा हुआ है। अब उस दसरतन के लिए मुझे ढेरों झब्बे सिलने हैं। गवरइया बोली वह इस कपड़े की दो टोपियाँ बना दें। एक वह स्वयं ले ले और दूसरी उसे दे दे। इतना सुनते ही दर्जी उसी समय टोपी सिलने को तैयार हो गया। खुश होकर दर्जी ने टोपी पर अपनी ओर से पाँच फुँदने भी लगा दिए। टोपी पहनकर गौरैया के पैर धरती पर नहीं रुक रहे थे वह फुदक रही थी,

टोपी ने गवरहया में एक नवीन जोश और उल्लास भर दिया था। इस उल्लास में वाह उडते उड़ते राजा के कंगूरे पर जा बैठी। वहाँ राजा अर्धनग्न अवस्था में सेवकों से अपने शरीर की मालिश करवा रहा था। अचानक राजा ने टोपी पहनी गवरइया को देखा। उसे देखकर राजा को अकल चकरा गई। गवरइया लगातार कह रही थी, "मेरे सिर पर टोपी, राजा के सिर पर टोपी नहीं।" इतना सुनते ही राजा अपने सिर को हाथों से होते हुए जोर से चिल्लाया, "अरे कोई मेरी टोपी लाओ... जरा जल्दी।"

राजा ने उसी समय टोपी पहन ली, लेकिन गवरइया पुनः कहने लगी "मेरी टोपी में पाँच फुँदने।" वह लगातार यही बोलती जा रही थी, "राजा की टोपी में एक भी नहीं, मेरी टोपी में पाँच फैदने, राजा की टोपी में फुँदने नहीं।" राजा अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने कहा, "इस फदगुदी को गर्दन मसल दो... पखने नोच लो... सिपाहियो, देर न करो।" तभी एक सिपाही ने गुलेल से गवरइया की टोपी गिरा दी और दूसरे ने झट से उठा ली। राजा टोपी को मसलने ही जा रहा था कि वह उसकी सुंदरता को देखकर मुग्ध हो गया।

राजा सोचने लगा कि इतनी सुंदर टोपी इस देश में किसने बनाई है। राजा के आदेश पर क्षमा याचना करता हुआ दर्जी आया। राजा ने रोष भरे स्वर में कहा, "इतनी बढ़िया टोपी तुमने कभी हमारे लिए क्यों नहीं बनाई?" कारण पूछने पर दर्जी ने कहा कि महाराज! कपड़ा बहुत अच्छा था। तब कपड़ा बुनने वाला लाया गया। वह भी क्षमा याचना करने लगा। कारण बताते हुए वह कहने लगा, "सूत बड़ा ठम्दा था सरकार। एकदम महीन और लच्छेदार।" दहाड़ मारते हुए राजा बोला कि इतना बारीक सूत किसने काता, उसे सामने लाओ। गिरते-पड़ते कोरी आ गया, राजा ने कहा कि बजह बताओ। कोरी बोला, "रुई बड़ी बेहतरीन श्री, सरकार! एकदम बादलों की तरह धुनी हुई थी।" तभी हाँफते हुए धुनिया आया और वह भी क्षमा-याचना करने लगा। राजा ने पुनः कहा, "क्षमा नहीं बजह बताओ।" राजा अत्यंत क्रोध में बोला-"तुम चारों अपराधी हो, तुमने मिलकर इस गवरझ्या का काम किया है।"

धुनिया ने डरते-डरते राजा से कहा कि यदि अभय दान दे तो वह बोले राजा बोला, "चलो दिया।" धुनिया कहने लगा, "महाराज! इस गवरइया ने जो भी काम करवाया, उसमें आधा हिस्सा दे देती थी। जिसके पास बहुत कुछ है, वह कुछ भी नहीं देता। इसके पास कुछ भी नहीं था, फिर भी यह आधा दे देती थी। इसलिए इसके काम में अपने आप नफ़ासत आती गई, सरकार।" यह सब सुनकर राजा भाँचक्का रह गया। गवरइया पुनः चिल्लाने लगी, "यह राजा तो कंगला है... इसे टोपी तक नहीं जुरती.... तभी इसने मेरी टोपी छीन ली।"

हो-हल्ला सुनने के बाद काफी संख्या में लोग इकट्ठे हो गए। वे सारे दृश्य को देखने लगे तभी राजा घबराते हुए बोला, "इसकी टोपी वापस कर दो।" गवरइया ने पुनः टोपी पहन ली और कहने लगी, "यह राजा तो डरपोक है, इसने मेरी टोपी लौटा दो।" राजा मंत्री से कहने लगा, "कौन इस मुँहफट के मुँह लगे?" यह कहकर उसने अपनी टोपी कसकर पकड़ ली।

टोपी का प्रश्न उत्तर

1- गवरइया और गवरा के बीच किस बात पर बहस हुई और गवरइया को अपनी इच्छा पूरी करने का अवसर कैसे मिला?

उत्तर- गवरैया और गवरा के बीच कपड़े पहनने को लेकर बहस हुई। दोनों कपड़े के विषय में अपने-अपने तर्क दे रहे थे गवरैया कपड़े पहनने के पक्ष में थी, जबकि गवरा कपड़ों को अनुचित मानता था। उसके अनुसार कपड़ों ने मानव को आलसी एवं आराम परख बना दिया है। एक दिन गवरा और गवरइया घूरे पर दाना चुगने के लिए गए। वहाँ दाना चुगते-चुगते गवरइया को रुई का एक फाहा मिला, जो अन्ततः गवरइया की इच्छा को पूरा करने का कारण बना।


2- गवरइया और गवरे की बहस के तर्कों को एकत्र करें और उन्हें संवाद के रूप में लिखें।

उत्तर-
गवरइया-" आदमी को देखते हो? कैसे रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं। कितना फबता है उन पर कपड़ा।
गवरा-"खाक फबता है। कपड़ा पहनने के बाद आदमी और बदसूरत लगने लगता है।"

गवरइया-"लगता है आज लटजीरा चुग गए हो?"
गवरा-"कपड़े पहन लेने के बाद आदमी की कुदरती खूबसूरती ढक जो जाती है।"

गवरइया-"कपड़े केवल अच्छा लगने के लिए नहीं मौसम की मार से बचने के लिए भी पहनता है आदमी।"
गवरा-(हँसकर) "तू समझती नहीं। कपड़े पहन-पहनकर जाड़ा-गर्मी-बरसात सहने की उनकी सकत भी जाती रही है और इस कपड़े में बड़ा लफड़ा भी है।

गवरइया-"उनके सिर पर टोपी कितनी अच्छी लगती है। मेरा मन भी टोपी पहनने को करता है।"
गवरा-"यह निरा पोंगापन है। टोपी तू पाएगी कहाँ से?"

3- टोपी बनवाने के लिए गवरइया किस किस के पास गई ? टोपी बनने तक के एक-एक कार्य को लिखें।

उत्तर - टोपी बनवाने के लिए गवरइया सर्वप्रथम रुई का फाहा लेकर धुनिया के पास पहुँची। उसने उससे बड़ी विनम्रता से रुई धुनने को कहा। गवरइया द्वारा आधी रुई देने के आश्वासन पर धुनिया ने रुई धुन दी। इसके बाद गवरइया रुई लेकर एक कोरी के पास गई और उसे रुई से सूत कातने को कहा। उसने यहाँ भी आधे-आधे की पेशकश की और कोरी ने रुई से सूत बना दिया। इसके बाद गवरइया सूत लेकर बुनकर के पास पहुंची और उसे बड़ी विनम्रता से सूत से कपड़ा बुनने को कहा। बुनकर द्वारा आनाकानी करने पर गवरइया ने कपड़े को आधा-आधा बाँट लेने की बात कही, तब बुनकर मान गया। कुछ ही समय में उसने एक सुंदर-सा कपड़ा तैयार कर दिया। तत्पश्चात् कपड़ा लेकर गवरइया दर्जी के पास पहुँची। वहाँ भी गवरइया ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया और दर्जी से दों टोपी बनाकर एक उसे देने और एक स्वयं रखने की बात कही। यह बात सुनकर दर्जी ने जल्दी ही सुंदर टोपियाँ बना दीं। दर्जी ने अपनी ओर से टोपी पर पाँच फुँदने भी लगा दिए। इस प्रकार गवरइया की टोपी तैयार हुई।

4- गवरइया की टोपी पर दर्जी ने पाँच फुँदने क्यों जड़ दिए?

उत्तर- दर्जी राजा की सातवीं रानी की दसवीं संतान के लिए झब्बे सिल रहा था। राजा की ओर से उसे इसका कोई मेहनताना भी नहीं मिलना था। एक प्रकार से वह बेगारी कर रहा था। दूसरी और गवरइया ने दर्जी को आधा कपड़ा देकर उसे मुँहमाँगी मजदूरी दे दी। इससे दर्जी बहुत खुश था। इसी खुशी एवं उल्लास में उसने टोपी पर पाँच फुँदने लगा दिए।

टोपी कहानी से आगे

1- किसी कारीगर से बातचीत कीजिए और परिश्रम का उचित मूल्य नहीं मिलने पर उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? ज्ञात कीजिए और लिखिए।

उत्तर- एक बार मैंने एक मोटर मैकेनिक से बात की और पूछा कि जब तुम्हें तुम्हारी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिलता तो तुम्हें कैसा लगता है? तब उसने कहा कि उसका मन अंदर-ही-अंदर कुढ़ता रहता है। वह दिए गए कार्य को अनमने ढंग से करता है। उस कार्य को करने में उसकी कोई इच्छा नहीं लेती। वह अपना खून जलाकर दिए गए कार्य को पूरा करता है।

2- गवरइया की इच्छा पूर्ति का क्रम घूरे पर रुई के मिल जाने से प्रारंभ होता है। उसके बाद वह क्रमशः एक-एक कर कई कारीगरों के पास जाती है और उसकी टोपी तैयार होती है। आप भी अपनी कोई इच्छा चुन लीजिए। उसकी पूर्ति के लिए योजना और कार्य-विवरण तैयार कीजिए।

उत्तर - विद्यार्थी अपने अध्यापक-अध्यापिका की सहायता से स्वयं कीजिए।

3- गवरइया के स्वभाव से यह प्रमाणित होता है कि कार्य की सफलता के लिए उत्साह आवश्यक है। सफलता के लिए उत्साह की आवश्यकता क्यों पड़ती है, तर्क सहित लिखिए।

उत्तर - किसी भी कार्य की सफलता के लिए उत्साह की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि उत्साह व्यक्ति में विशेष प्रकार की ऊर्जा का संचार करता है। उत्साह व्यक्ति को कार्य के प्रति समर्पण के लिए प्रेरित करता है। उत्साह व्यक्ति को कार्य में कुशलता प्रदान कर सफलता प्राप्त करने के योग्य बनाता है। इसलिए सफलता प्राप्त करने के लिए उत्साह की आवश्यकता पड़ती है।

टोपी अनुमान और कल्पना

1- टोपी पहनकर गवरइया राजा को दिखाने क्यों पहुंची जबकि उसकी बहस गवरा से हुई और वह गवरा के मुँह से अपनी बड़ाई सुन चुकी थी। लेकिन राजा से उसकी कोई बहस हुई ही नहीं थी। फिर भी वह राजा को चुनौती देने पहुँची। कारण का अनुमान लगाइए।

उत्तर - टोपी पहनकर गवरइया राजा को दिखाने इसलिए पहुँची, क्योंकि राज्य में सारे कार्य उसी के लिए हो रहे थे लेकिन आज गवरइया ने अपनी सुंदर टोपी उन कामों को रोककर बनवाई थी। इसलिए वह राजा को टोपी दिखाने उसके महल जा पहुँची। राजा को टोपी दिखाने और चुनौती देने का एक कारण यह भी था कि राजा राज्य के कारीगरों से बेगारी लेता था, जिस कारण वे लोग राजा के कार्य अनमने ढंग से करते थे। लेकिन उचित मूल्य देने पर वही कारीगर कार्य को बड़ी निपुणता से करने लगे यह प्रमाण दिखाने वह महल जा पहुँची।

2- यदि राजा के राज्य के सभी कारीगर अपने-अपने श्रम का उचित मूल्य प्राप्त कर रहे होते तब गवरडया के साथ उन कारीगरों का व्यवहार कैसा होता?

उत्तर - यदि राजा के राज्य के सभी कारीगर अपने-अपने श्रम का उचित मूल्य प्राप्त कर रहे होते, तब वे गवरइया के साथ बड़े प्यार से बात करते। वे बिना विनती करवाए उसका काम करते। काम करने की मजदूरी भी शायद न लेते। उस समय अपनी दक्षता का उचित मूल्य मिलने के कारण उनके मन का लोभ लगभग समाप्त हो चुका होता।

3- चारों कारीगर राजा के लिए काम कर रहे थे। एक रजाई बना रहा था दूसरा अचकन के लिए सूत कात रहा था। तीसरा बागा बुन रहा था। चौथा राजा की सातवों रानी की दसवीं संतान के लिए झख्ये सिल रहा था। उन चारों ने राजा का काम रोककर गवरइया का काम क्यों किया?

उत्तर - चारों कारीगरों ने राजा का काम छोड़कर गवरइया का काम इसलिए किया, क्योंकि गवरइया उन्हें उनकी मेहनत का उचित दाम दे रही थी। दूसरी तरफ राजा नित्य उनसे बेगारी करवाता था वह उन्हें न तो वेतन देता था और न ही कोई मेहनताना। वह मात्र उनका शोषण करता था, जबकि गवरइया ने बिना कहे सभी को आधा हिस्सा दे दिया। इसलिए सभी कारीगरों ने खुश होकर गवरइया का काम बड़ी सजगता एवं निपुणता के साथ संपन्न किया।

टोपी भाषा की बात

1- गाँव की बोली में कई शब्दों का उच्चारण अलग होता है। उनकी वर्तनी भी बदल जाती है। जैसे गवरइया गौरेया का ग्रामीण उच्चारण है। उच्चारण के अनुसार इस शब्द की वर्तनी लिखी गई है। फुँदना, फुलगेंदा का बदला हुआ रूप है। कहानी में अनेक शब्द हैं जो ग्रामीण उच्चारण में लिखे गए हैं, जैसे-मुलुक-मुल्क, खमा-क्षमा, मजूरी-मजदूरी, मल्लार-मल्हार इत्यादि। आप क्षेत्रीय या गाँव की बोली में उपयोग होनेवाले कुछ ऐसे शब्दों को खोजिए और उनका मूल रूप लिखिए, जैसे-टेम-टाइम, टेसन/टिसन-स्टेशन।

उत्तर - झुटपुटा - सवेरा या शाम का समय। खोतें- घोंसले; फबना- अच्छा लगना; मानुस - मनुष्य; सकत - ताकत/सहने की शक्ति; मामूल - वह बात जो रोज की जाए; लोटने - लेटने; चिहाकर - चिल्लाकर; बावरा - बावला; मनुहार - मनाना; मतलार - मल्हार; मुलुक- मुल्क; बरधा- बैल; लगुए-भगुए हुलास - उल्लास; जुरना - जुड़ना; खमा - क्षमा; पाखी - पक्षी।

2- मुहावरों के प्रयोग से भाषा आकर्षक बनती है। मुहावरे वाक्य के अंग होकर प्रयक्त होते हैं। इनका अक्षरशः अर्थ नहीं बल्कि लाक्षणिक अर्थ लिया जाता है। पाठ में अनेक मुहावरे आए हैं। टोपी को लेकर तीन मुहावरे है। जैसे-कितनों को टोपी पहनानी पड़ती है। शेष मुहावरों को खोजिए और उनका अर्थ ज्ञात करने का प्रयास कीजिए।


1. टोपी उछालना- अपमानित करना
वाक्य-आजकल के नेता एक-दूसरे की टोपी उछालने में लगे रहते हैं।

2. टोपी सलामत रहना - इज्जत बनी रहना।
वाक्य-मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि समाज में मेरी टोपी सदा सलामत रहे।

3- ओझल हो जाना-गायब हो जाना।
वाक्य-पहरेदार को देखते ही आम चुराने वाला लड़का आँखों से ओझल हो गया

4- आँखों में चमक आना-मन की खुशी प्रकट होना।
वाक्य-लॉटरी के निकलते ही आस्था की आँखों में चमक आ गई।

5- . माथे का पसीना पोंछना-घबरा जाना
वाक्य- अपना परीक्षा परिणाम देखते हुए रोहित माथे का पसीना पोंछने लगा।

टोपी कहानी के अन्य प्रश्न उत्तर

1- टोपी कहानी किसकी रचना है?

उत्तर- टोपी कहानी सृंजय की रचना है

2- टोपी कहानी का संदेश क्या है?

उत्तर - टोपी कहानी के माध्यम से लेखक ने समाज में फैली बेगारी की समस्या को दूर करके योग्यता के अनुसार कारीगरों को उनका उचित मेहनताना देने की बात कही है लेखक यही संदेश हर जगह पहुंचाना चाहता है कि उचित मूल्य मिलने पर कारीगर पूर्ण दक्षता एवं निपुणता के साथ कार्य करता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.